रे चित्त मा त्यज वनं वृषभानुजायाः नान्यत्र गच्छ मम याचिलमेतदेव ।
वृन्दावने त्वमिह आश्वपचान् सदैव याचत्व भक्षय तदीयसुभुक्तमुक्तम् ॥
- श्री वागीश शास्त्री जी, श्री राधासप्तशती (5.61)
हे चित्त ! तुझसे मेरी एकमात्र यही प्रार्थना है कि तू श्रीवृषभानुनन्दिनी (श्री राधा) के इस श्रीवृन्दावन धाम को कभी न छोड़ना। यदि तुझे ब्राह्मण से लेकर श्वपच पर्यन्त के घर सदैव भिक्षा माँगनी पड़े तो माँग लेना और उनके उच्छिष्ट को भी खा लेना; परंतु श्रीवृन्दावन से बाहर अन्य स्थान मे कदापि न जाना ।
वृन्दावने त्वमिह आश्वपचान् सदैव याचत्व भक्षय तदीयसुभुक्तमुक्तम् ॥
- श्री वागीश शास्त्री जी, श्री राधासप्तशती (5.61)
हे चित्त ! तुझसे मेरी एकमात्र यही प्रार्थना है कि तू श्रीवृषभानुनन्दिनी (श्री राधा) के इस श्रीवृन्दावन धाम को कभी न छोड़ना। यदि तुझे ब्राह्मण से लेकर श्वपच पर्यन्त के घर सदैव भिक्षा माँगनी पड़े तो माँग लेना और उनके उच्छिष्ट को भी खा लेना; परंतु श्रीवृन्दावन से बाहर अन्य स्थान मे कदापि न जाना ।

