श्रीराधावल्लभ तुम मेरे हित - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (288)

श्रीराधावल्लभ तुम मेरे हित - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (288)

(राग कान्हरो)
श्रीराधावल्लभ तुम मेरे हित।
और सबै स्वारथ के संगी, गुर चोपरी दै पोषत पितु॥ [1]
यह मैं जानि सबनि सौं तोरी, तुमसौं जोरी दै चरनन चितु।
इतनी आस व्यास की पुजवहु, ज्यौं चातिक पोषत पावस-रितु॥ [2]
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (288)

हे श्रीराधावल्लभ! आप ही मेरे सच्चे हितैषी हैं। संसार के समस्त रिश्ते केवल तब तक ही साथ देते हैं जब तक उनका स्वयं का कोई स्वार्थ जुड़ा हो। [1]

इस जगत के स्वार्थमय स्वभाव को भलीभाँति समझकर, मैंने सारे सांसारिक बंधनों को तोड़कर अपने चित्त को केवल आपके चरणों में अर्पित कर दिया है। श्री हरिराम व्यास विनती करते हैं — जैसे चातक पक्षी केवल मेघ की बूँद से ही प्यास बुझाता है, वैसे ही मेरा मन आपके प्रेमरस से ही पूर्ण तृप्ति प्राप्त करे, ऐसी मेरी कामना है। [2]