श्री स्वामी हरिदास के चरन कमल चित लाउ - श्री कान्त किशोर, कान्त रसिक जी की वाणी, दोहा (1)

श्री स्वामी हरिदास के चरन कमल चित लाउ - श्री कान्त किशोर, कान्त रसिक जी की वाणी, दोहा (1)

श्री स्वामी हरिदास के, चरन कमल चित लाउ।
कान्त रसिक रस-माधुरी, लखै न और उपाउ॥

- श्री कान्त किशोर, कान्त रसिक जी की वाणी, दोहा (1)

मैं अपने मन को श्रीस्वामी हरिदास जी के परम पावन चरणकमलों में लगाता हूँ। श्री कान्त रसिक कहते हैं कि प्रिया-प्रियतम की रस माधुरी का अवलोकन एवं अनुभव करने का इससे सुंदर कोई अन्य उपाय नहीं है।