और जाकी वंशी सुनिबे कौं तरसत - श्री नागरीदास जी की वाणी, व्रज सार (19)

और जाकी वंशी सुनिबे कौं तरसत - श्री नागरीदास जी की वाणी, व्रज सार (19)

(कवित्त)
और जाकी वंशी सुनिबे कौं तरसत,
सोब राधा बैंन सुनिबे कौं हियै सरसत हैं। [1]
ताकी सब कृपा चहैं चहैं कृपा राधा की सो,
इकटक रहैं नैंन नांहि अरसत हैं॥ [2]
जाके पाय पंकजनि राखैं कुच बीच किती, 
“नागरिया” पायन सौं नैंन परसत हैं। [3]
जाके देखिबे कौं सब तरसत सोई हरि,
राधा मुख देखिबे कौं नित्य तरसत हैं॥ [4]
- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह), श्री नागरीदास जी की वाणी, व्रज सार (19)

जिस बांसुरी की ध्वनि को सारी सृष्टि सुनने को तरसती है, वे श्रीकृष्ण श्री राधा की बोली को सुनने के लिए व्याकुल रहते हैं। [1]

जिनकी कृपा पाने को सभी तरसते हैं, वे श्रीकृष्ण स्वयं श्री राधा की कृपा पाने के लिए उन्हें इकटक निहारते रहते हैं एवं अघाते नहीं। [2]

जिन श्री कृष्ण के चरणों की सेवा एवं स्पर्श को प्राप्त करने के लिए सभी ललचाते रहते हैं, एवं महालक्ष्मी भी जिनके चरणों को हृदय से लगा कर रखती हैं, वे श्री कृष्ण श्री राधा के चरणों के नित्य सेवक हैं एवं उन श्री चरणों को अपने नेत्रों से प्रेमपूर्वक स्पर्श करते हैं। [3]

श्री नागरीदास कहते हैं कि जिन श्रीकृष्ण के दर्शन को सारी सृष्टि तरसती है, वही श्रीकृष्ण राधा रानी के मुख-दर्शन को प्रतिक्षण तरसते रहते हैं। [4]