आशिक होकर इश्क कमावे - श्री सरस माधुरी जी

आशिक होकर इश्क कमावे - श्री सरस माधुरी जी

(सवैया)
आशिक होकर इश्क कमावे,  सो प्रीतम मन भाता है।
लोक वेद की कैद दूर कर,  प्रेम देव को ध्याता है ॥ [1]
रोवे हँसे मौन हो बैठे,  प्यारे के रंग राता है।
सरसमाधुरी का रस पीकर, दिलवर के गुण गाता है ॥ [2]

- श्री सरस माधुरी

जो स्वयं प्रेमी बनकर प्रेम धन कमाता है, ऐसा प्रेमी भक्त ही प्रियतम (श्री कृष्ण) के मन को भाता है । जो लोकाचार और वेदों के बंधनों को त्यागकर, केवल प्रेम देवता का ध्यान करता है, वही सच्चा भक्त है। [1]

कभी रोना, कभी हँसना, कभी मौन रहना — ये सब उस प्रेमानंद में डूबे हुए प्रेमी के लक्षण हैं, जो प्रियतम के रंग में पूरी तरह रँगा हुआ होता है। सरस माधुरी कहते हैं कि ऐसे प्रेमी भक्त प्रेम का सरस रस पीकर, प्रियतम के गुणों का सदा प्रेमपूर्वक गान करते हैं । [2]