श्री राधिका माधव छवी अपार - श्री प्रिया सखी (श्री ब्रह्म गोपाल गोस्वामी), हरि लीला (18)

श्री राधिका माधव छवी अपार - श्री प्रिया सखी (श्री ब्रह्म गोपाल गोस्वामी), हरि लीला (18)

(दोहा)
छवि अपार श्रृंगार की, आरति जय जय कार।
करत प्रेम परिवार मिल, बार बार बलिहार॥

(पद)
श्री राधिका माधव छवी अपार।
करत प्रेम परिवार मिलीं, अलि आरति रति श्रृंगार॥ [1]
वीनावेनु वाद्यवर विलसित, गावत जय जय कार।
श्री प्रियासखी तृनतोर जोर कर, बार बार बलिहार॥ [2]
- श्री प्रिया सखी (श्री ब्रह्म गोपाल गोस्वामी), हरि लीला (18)

(दोहा)
श्रीराधा-कृष्ण के सुन्दर श्रृंगार की छवि अद्भुत है, सखियाँ आरती करती हुई उनकी जय-जयकार कर रही हैं। सब सखी-परिवार मिलकर बार-बार स्वयं को न्योछावर कर रहा है।

(पद)
श्री राधिका-माधव की शोभा बड़ी ही अद्भुत एवं अलौकिक है। सखियाँ प्रेमपूर्वक उनका श्रृंगार कर आरती कर रही हैं। [1]

कुछ वीणा, कुछ वेणु, और कुछ अन्य वाद्य बजा रही हैं; प्रेम में उन्मत्त होकर जय जय कार कर रही हैं। श्री प्रियासखी प्रेम में विभोर होकर, तृण तोड़कर स्वयं को युगल किशोर की सुन्दर जोड़ी पर न्योंछावर कर रही हैं। [2]