माई री! नंद-नंदन मेरौ मन जु हर्यौ - श्री छीत स्वामी

माई री! नंद-नंदन मेरौ मन जु हर्यौ - श्री छीत स्वामी

(राग कल्याण)
माई री! नंद-नंदन मेरौ मन जु हर्यौ।
खरिक दुहावन जात रही हौं, मो तन मुसिकनि ना जानौं कहा कर्यौ॥ [1]
ता छिनु तें मोहि कछु न सुहाइ री? हिय में आइ पर्यौ।
“छीत-स्वामी” गिरिधर मिलई, तुम्हें ह्रिदई मांझ धर्यौ॥ [2]
- श्री छीत स्वामी

एक सखी अन्य सखी से कहती है — हे सखी! नंदनंदन श्रीकृष्ण ने मेरा मन चुरा लिया है। जब मैं गाय का दूध दुहने जा रही थी, तभी कृष्ण ने मेरी ओर देखकर मुस्कुरा दिया और न जाने कौन सा जादू कर दिया। [1]

उस क्षण से मेरा मन किसी कार्य में नहीं लग रहा, क्योंकि कृष्ण का रूप मेरे हृदय में पूर्ण रूप से बस गया है। श्री छीतस्वामी कहते हैं — जब गिरिधर लाल श्रीकृष्ण अब स्वयं मिलेंगे, तभी यह मन स्थिर होगा, अन्यथा नहीं। [2]