(सवैया)
मुसकान से काम तमाम हुआ, तिरछे दृग क्यों अब तानता है।
अति सुन्दर गोल कपोल तेरे, भृकुटी-लकुटी पहिचानता है ॥ [1]
परिणाम में दुःखको जानता है, पर हाय नहीं हठ ठानता है ।
बहुतेरा कहा पर तेरे बिना, मन मेरा न मोहन ! मानता है ॥ [2]
- ब्रज के सवैया
एक भक्त श्रीकृष्ण से कहता है — हे प्यारे! तेरी मुस्कान से ही मेरा मन मोहित हो गया, अब तिरछी चितवन से क्यों इसे घायल करता है? तेरे कपोलों की कोमलता और भौंहों की चंचलता हृदय को घायल करती है। [1]
जानता हूँ यह प्रेम अंत में पीड़ा देगा, फिर भी मन हठ नहीं छोड़ता। हे श्याम! लाख समझाऊँ, पर तेरे बिना यह मन किसी का कहा नहीं मानता। [2]
मुसकान से काम तमाम हुआ, तिरछे दृग क्यों अब तानता है।
अति सुन्दर गोल कपोल तेरे, भृकुटी-लकुटी पहिचानता है ॥ [1]
परिणाम में दुःखको जानता है, पर हाय नहीं हठ ठानता है ।
बहुतेरा कहा पर तेरे बिना, मन मेरा न मोहन ! मानता है ॥ [2]
- ब्रज के सवैया
एक भक्त श्रीकृष्ण से कहता है — हे प्यारे! तेरी मुस्कान से ही मेरा मन मोहित हो गया, अब तिरछी चितवन से क्यों इसे घायल करता है? तेरे कपोलों की कोमलता और भौंहों की चंचलता हृदय को घायल करती है। [1]
जानता हूँ यह प्रेम अंत में पीड़ा देगा, फिर भी मन हठ नहीं छोड़ता। हे श्याम! लाख समझाऊँ, पर तेरे बिना यह मन किसी का कहा नहीं मानता। [2]

