कांम ही न क्रोध जाकै - श्री सुंदरदास जी

कांम ही न क्रोध जाकै - श्री सुंदरदास जी

(कवित्त)
कांम ही न क्रोध जाकै, लोभ ही न मोह ताकै,
मद ही न मछर न, कोऊ न विकारौ है। [1]
दुख ही न सुख मानै, पाप ही न पुन्य जानै,
हरष न शोक आनै, देह ही तै न्यारौ है॥ [2]
निंदा न प्रशंसा कर, राग ही न दोष धरै,
लेन ही न देन जाकै, कछून पसारौ है। [3]
‘सुन्दर’ कहत ताकी, अगम अगाध गति,
ऐसौ कोऊ साधु सु तौ, रामजी को प्यारौ है॥ [4]
- श्री सुंदरदास जी

जिसमें न काम है, न क्रोध है; न लोभ, न मोह; न अहंकार, न ईर्ष्या; उसमें कोई भी विकार नहीं है। [1]

जो न सुख-दुख में भेद करता है, न पाप-पुण्य में, न हर्षित होता है, न शोक करता है, और देहाभिमान से रहित है। [2]

जो निंदा-प्रशंसा से रहित है, राग-द्वेष से मुक्त है, न लेन-देन की भावना रखता है, न किसी प्रकार का संसार संग्रह करता है। [3]

सुंदरदास कहते हैं, ऐसे साधु की स्थिति अगम्य और अगाध है। ऐसा कोई विरला साधु ही रामजी को अत्यंत प्यारा होता है। [4]