श्रीकुंजबिहारिनि ललित लाडिली - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (4)

श्रीकुंजबिहारिनि ललित लाडिली - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (4)

श्रीकुंजबिहारिनि ललित लाडिली, 
अद्भुत रूप रसाला। [1]
हँसनि लसनि मुसकनि रस बरसत, 
लालै करति निहाला॥ [2] 
उमँगि उमँगि दोउ मदन लडावत, 
दोउ दोउन उरमाला। [3]
श्रीललितकिसोरी के हित विहरत, 
जानि महा निजु हाला॥ [4]
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (4)

निकुंज में विहार करने वाली कुंजबिहारिणी (श्रीराधा) अद्भुत रूप और माधुरी की खान हैं। [1]

उनकी मधुर मुस्कान से प्रेमरस बरसता है जिससे वे श्यामसुंदर को सदा निहाल करती रहती हैं। [2]

दोनों प्रेम-रस की उमंग में डूबे हुए, एक-दूसरे से ऐसे लिपटे हैं मानो दोनों एक दूसरे के हृदय का हार हों। [3]

श्री ललित किशोरी कहती हैं कि अपनी निज सखियों के हृदय के भावों को पूर्ण करने के लिए ही श्री राधा अपने प्रियतम कुंज बिहारी संग सदा नित्य विहार रस बरसाती रहती हैं। [4]