बिपुल बिहारिनिदासि तैं, अब छिन छिन मन आनंद।
यौं निरखत नागरीदास नित, दूलहु दुलहिनि मकरन्द॥
- श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जी की वाणी, साखी (19)
श्री बीठलविपुलदेव जू एवं श्री बिहारिनदेव जू के संग से मेरा मन अब प्रतिक्षण आनंद में निमग्न रहता है। इन्हीं की कृपा-बल से नित्य दूल्हा-दुल्हन, श्री श्यामा कुंजबिहारी के रस-बिलास को मैं सतत निहारता रहता हूँ।
यौं निरखत नागरीदास नित, दूलहु दुलहिनि मकरन्द॥
- श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जी की वाणी, साखी (19)
श्री बीठलविपुलदेव जू एवं श्री बिहारिनदेव जू के संग से मेरा मन अब प्रतिक्षण आनंद में निमग्न रहता है। इन्हीं की कृपा-बल से नित्य दूल्हा-दुल्हन, श्री श्यामा कुंजबिहारी के रस-बिलास को मैं सतत निहारता रहता हूँ।

