(राग श्याम कल्याण)
बंसरी बजावै नन्द जू कौ लाल।
जमना तट बंसीवट ठाड़ौ, सुन्दर रूपरसाल॥ [1]
मोर मुकुट पीताम्बर सोहै, चंचल नैंन विशाल।
कानन कुण्डल गल बिच माला, श्रीतिलक दिये भाल॥ [2]
वृन्दावन में रास रच्यौ है, राधा फिरत खुशाल।
'गुरुछौना' के हिये बसे नित, दरसन करत निहाल॥ [3]
- श्री गुरु छौनाजी महाराज, रास महोत्सव के पद (103)
नन्दनन्दन श्रीकृष्ण यमुना के पुलिन पर वंशीवट की छाया में मधुर बंसी बजा रहे हैं। उनका रूप अत्यन्त रससिक्त एवं मनोहर है। [1]
उनके सिर पर मोर-मुकुट और तन पर पीताम्बर सुशोभित है, और उनके नेत्र चंचल व विशाल हैं। कानों में कुण्डल, गले में पुष्पमाला और भाल पर तिलक शोभायमान है। [2]
वृन्दावन में रासोत्सव में श्री राधा अत्यंत प्रसन्न होकर विहार कर रही हैं। श्री गुरुछौना कहते हैं—श्यामाश्याम नित्य मेरे हृदय में विराजते हैं, जिनके दर्शन पाकर मैं सर्वदा कृतार्थ होता रहता हूँ। [3]

