लक्ष्म्या यश्च न गोचरीभवति यन्नापुः - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (239)

लक्ष्म्या यश्च न गोचरीभवति यन्नापुः - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (239)

लक्ष्म्या यश्च न गोचरीभवति यन्नापुः सखाय: प्रभोः। सम्भाव्योपि विरंचिनारदशिवस्वायंभुवाद्यैर्न यः।
यो वृन्दावननागरीपशुपतिस्त्रीभावलभ्यः कथं राधामाधवयोर्ममास्तु स रहो दास्याधिकारोत्सव:॥
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (239)

लक्ष्मी को भी जिसका साक्षात्कार नहीं होता, जिसे श्रीदामा आदि सखागण भी प्राप्त नहीं कर सके, जो ब्रह्मा, नारद, शिव, सनकादि के द्वारा कल्पनीय नहीं है, जो श्रीवृन्दावन की नागरी गोपिकाओं (ललितादिकों) के भाव (सखी भाव) द्वारा (ही) प्राप्त है, श्रीराधामाधव के उस एकान्त दास्य का अधिकार मुझे कैसे मिले ?