जो क्रीड़ा वृन्दावन कीनी राधे सुंदरश्याम - श्री रूपरसिक देवाचार्य, विशिष्ट दोहा (33)

जो क्रीड़ा वृन्दावन कीनी राधे सुंदरश्याम - श्री रूपरसिक देवाचार्य, विशिष्ट दोहा (33)

जो क्रीड़ा वृन्दावन कीनी, राधे सुंदरश्याम।
‘रूपरसिक’ रसिकन की जीवन, एक वस्तु द्वै नाम॥
- श्री रूपरसिक देवाचार्य, विशिष्ट दोहा (33)

श्रीधाम वृन्दावन में जो युगल ने लीला की है, वही रसिकों का प्राण-जीवन और परम धन है। कहने को ये दो हैं—“राधे” और “श्याम”—परंतु वस्तुतः इनका प्राण एक ही है। अथवा यूँ कहें कि इन दोनों से प्रकट हुआ नित्य-विहार-रस वस्तुतः एक ही है।