अपने वशमें व्रजराज किये - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’

अपने वशमें व्रजराज किये - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’

(सवैया)
अपने वशमें व्रजराज किये, कहके वचनामृत आधे की जय जय।
सुर किन्नर कारज साधे की जै, व्रजजीवन-प्रेम-समाधे की जय जय ॥ [1]
रस रासेश्वरी की सदा जय हो, हरेकृष्ण ! सदा भववाधे की जय जय ।
अति सुन्दर रूप अगाधे की जै, वृषभानुकिशोरी श्रीराधे की जय जय ॥ [2]

- डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’

जिन्होंने अपने आधे वचनों के अमृत से व्रजराज श्रीकृष्ण को अपने वशीभूत कर लिया, ऐसी श्रीराधा की जय हो। जिनकी कृपा से देवताओं और किन्नरों के भी समस्त कार्य सिद्ध होते हैं, ऐसी प्रेमस्वरूपिणी, ब्रज की प्राणेश्वरी, श्रीराधा की जय हो! [1]

जो रास-विलास की अधिष्ठात्री हैं, कृपा-सिंधु हैं, और संसार की सभी विघ्न-बाधाओं का नाश करने वाली हैं, उन रासेश्वरी श्रीराधा को बार-बार प्रणाम, उनकी जय हो। अति मनमोहक और अगाध रूपवाली वृषभानु-किशोरी श्रीराधिका की जय हो, जय हो। [2]