प्यारी तू गुननि राइ सिरमौर - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (65)

प्यारी तू गुननि राइ सिरमौर - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (65)

(राग सारंग)
प्यारी तू गुननि राइ सिरमौर ।
गति में गति उपजति नाना राग रागिनी
तार मंदर सुर घोर॥ [1]
काहू कछू लियौ रेख छाया तौ
कहा भयौ झूठी दौर।
कहिं श्रीहरिदास लेत प्यारी जू के
तिरप लागनि में किसोर ॥ [2]

- श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (65)

हे कुंजबिहारिणी श्री राधे! आप समस्त गुणों में अग्रणी, राजाओं में सिरमौर हैं। नृत्य और गायन की अनुपम कला में आप अद्वितीय हैं। आपकी मनोहर गति से नाना प्रकार के राग-रागिनी सहज ही प्रकट होते हैं, जिनकी मधुर गूँज तीव्र और मंद्र स्वरों में चारों ओर फैल रही है। [1]

यदि कोई कहे कि उसने आपकी इस अद्भुत गति की केवल छाया की रेखा मात्र को भी पा लिया है, तो यह बात सर्वथा असंभव और असत्य है। स्वामी श्रीहरिदास जी कहते हैं—किशोर श्याम आपकी कर-भंगिमाओं को ग्रहण कर उरप-तिरप नृत्य गति में लीन होकर नाच रहे हैं। [2]