रतन खचित कंचन महा, श्री वृदावन की भूमि।
कल्पवृक्ष से द्रुम रहे, फल फूलन करि झूमि॥
- गोस्वामी श्री हरिराय जी, वल्लभ साखी (80)
श्रीवृन्दावन की महान भूमि रत्नों से जड़ी हुई स्वर्णमयी है जहाँ समस्त वृक्ष कल्पवृक्ष हैं और फल-फूलों से लदी डालियाँ झूमती रहती हैं।

