(राग मलार)
गरजनि घन अरु दामिनी, चातीक पिक सुक बोलति मोरनि।
स्याम घटा काजर हूँ तें कारी, उमड़ि-उमड़ि आई चहुँ ओरनि॥ [1]
नान्हि-नान्हि बूँदनी बरषनि लाग्यो, तैसियै रोचक पवन झकोरनि।
‘हित ध्रुव’ प्यारी प्यार सौं झूलत, पियहि झुलावति नैंननि कोरनि॥ [2]
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (68)
वर्षा ऋतु के आगमन पर मेघों की गर्जना, विद्युत की चमक, चातक, कोयल, शुक और मोर के मधुर स्वर वातावरण को सुखमय बना रहे हैं। काजल से भी अधिक काले बादल चारों ओर से उमड़-घुमड़ कर आकाश कर घिर आए हैं। [1]
हल्की-हल्की बूँदों की फुहार और शीतल पवन के झोंके मानो प्रेमरस का संचार कर रहे हैं। श्रीहित ध्रुवदास जी कहते हैं कि ऐसे रमणीय दृश्य को निहारकर श्रीराधा प्रेम के झूले में झूलने लगती हैं और अपने प्रियतम श्रीकृष्ण को अपने नयनों के झूले में झुलाने लगती हैं। [2]

