लोक लाज कुल वेद, छूटे सबे विवेक बल। परे हृदे जब छेद, दुसह प्रेम के बानकों॥ - श्री दयाराम जी जब दिव्य प्रेम का तीव्र और असह्य बाण हृदय में लग जाता है, तब लोक-लाज, कुल-मर्यादा, वेद-शास्त्र, और विवेक का बल जैसी सारी सीमाएँ टूट जाती हैं।