रुप हू के रुप तै अनूप रुप प्यारी को - श्री किशोरी अलि जी, विनय के पद (8)

रुप हू के रुप तै अनूप रुप प्यारी को - श्री किशोरी अलि जी, विनय के पद (8)

(राग गोड)
रुप हू के रुप तै अनूप रुप प्यारी को। 
जग उजियारी जग जीवन की महारानी, 
आनन्द न भावै अंग लोचन निहारी को॥ [1]
पावक प्रकाश चंद दामिनी की कहा चामी, 
घटा दुरि जात ऐसो नीलो रंग सारी को। 
‘किशोरी’ स्वामिनी हिये में बसौ,
अचल सुहाग ठकुराइन हमारी को॥ [2]

- श्री किशोरी अलि जी, विनय के पद (8)

श्रीराधा का रूप-सौंदर्य ऐसा है कि साक्षात रूप भी उनके अनुपम रूप-सौंदर्य की तुलना में फीका लगता है। वे समस्त संसार को उज्ज्वल करने वाली तथा जगजीवन श्रीकृष्णचंद्र की महारानी हैं। उनका रूप प्रतिक्षण वर्धमान है, जिनके अंगों को निहारकर नेत्र कभी तृप्त नहीं होते। [1]

अग्नि की ज्योति, चाँद की आभा और बिजली की चमक—इनमें से कोई भी उनकी नीलवर्ण साड़ी से सुशोभित गौर छटा का वर्णन नहीं कर सकता। श्रीकिशोरी अली कहते हैं—हे स्वामिनी! आप सदा मेरे हृदय में निवास कीजिए, क्योंकि सदा-सुहागिन आप ही हैं, आप ही मेरी ठाकुरानी हैं। [2]