हेस्वामिनि श्रीकुंजविहारिनि - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (122)

हेस्वामिनि श्रीकुंजविहारिनि - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (122)

(राग खम्माच)
हेस्वामिनि श्रीकुंजविहारिनि, वेगि खवरि मेरी लीजै।
सेवा रीति कछू नहिं जानौं, चूक छिमा करि दीजै ॥ [1]
अति आधीन दीन रटि टेरों, चित्तदै यह सुनि लीजै।
ललितकिशोरी कुंज निकुंजन, रज अधिकारी कीजै ॥ [2]

- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (122)

हे स्वामिनी, श्री कुंज विहारिणी (श्री राधा)! कृपा करके शीघ्र मेरी सुध लें। मुझे सेवा की रीति कुछ भी नहीं आती, मेरी भूल को क्षमा कर दें। [1]

मैं अत्यंत ही अधीन और दीन होकर आपका नाम पुकारता हूँ, कृपा करके मेरे चित्त की पुकार सुन लें। हे ललित किशोरी! ऐसी कृपा कीजिए कि श्री धाम वृन्दावन के कुंजों-निकुंजों की रज प्राप्त करने का मुझे भी अधिकारी बना दीजिए । [2]