ब्रज-वासी-पटतर कोऊ नाहीं।
ब्रह्म, सनक, सिव, ध्यान न पावत,
इनकी जूँठन लै लै खाहीं॥ [1]
हलधर कह्यो, छाक जैवत सँग,
मीठौ लगत सराहत जाहीं।
'सूरदास' प्रभु जो विस्वम्भर,
सो ग्वालनके कौर अघाहीं॥ [2]
- श्री सूरदास, सूर सागर
ब्रजवासियों की बराबरी कोई नहीं कर सकता। जिन श्रीकृष्ण को ब्रह्मा, शिव, सनकादि आदि भी ध्यान में नहीं पा सकते, वही श्रीकृष्ण प्रेमवश ब्रजवासियों की जूठी थाली से अन्न ग्रहण करते हैं। [1]
बलराम कहते हैं कि ब्रजवासियों के संग जव वे छाछ पीते हैं तो वे अमृत समान मधुर लगती है, और वे उसकी प्रशंसा करते हैं । श्री सूरदास जी कहते हैं कि जो सम्पूर्ण जगत का पालन करने वाले विश्वम्भर हैं, वे ब्रज के ग्वालबालों के जूठे ग्रास खाने के लिए तरसते हैं। [2]

