(कवित्त)
कोमलता कंज ते, गुलाब ते सुगन्ध लैकें,
कोमलता कंज ते, गुलाब ते सुगन्ध लैकें,
चन्द्र सौं प्रकास लैकें, उदित उजेरौ है। [1]
रूप रति आनन सौं, चातुरी सुजानन सौं,
नीर नीरवानन सों, कौतुक निबेरौ है॥ [2]
'ठाकुर' विचारि कैं, बनायौ विधि कारीगर,
रचना निहारि कान्ह, होत चिर चेरौ है। [3]
सौने सौं सुरंग ले, सबाद लै सुधा कौ,
वसुधा-सुख लूटि कैं, बनायौ मुख तेरौ है॥ [4]
- श्री ठाकुर जी
कमल की कोमलता, गुलाब की सुगंध और चंद्रमा की शीतल आभा को लेकर, हे श्रीराधा, तुम्हारा अनुपम रूप साकार हुआ है। [1]
तुम्हारा मुख रति के मुख की भाँति मनोहर है, बुद्धिमत्ता सुजनों के समान उच्च है, और निर्मलता निर्मल जल के समान पवित्र है — यह सौंदर्य अद्भुत रीति से अलंकृत है। [2]
ठाकुरजी कहते हैं — जैसे कोई श्रेष्ठ कारीगर सूक्ष्म विचार के साथ अनुपम रचना करता है, वैसे ही विधाता ने यह दिव्य स्वरूप गढ़ा है; जिसे देखकर श्रीकृष्ण मोहित होकर बार-बार निहारते रहते हैं। [3]
सोने का कान्तिमान रंग, अमृत के समान मधुर, और समस्त संसार का सुख समेटकर, हे श्रीराधा, तुम्हारा मुख निर्मित हुआ है। [4]

