धेनु दुहत मोहन ठगे, राधा रूप निहार।
परत दोहनी तैं निकसि, ऐंडीबैंडी धार॥
- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह), श्री नागरीदास जी की वाणी, दोहनानन्दाष्टक (4)
परत दोहनी तैं निकसि, ऐंडीबैंडी धार॥
- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह), श्री नागरीदास जी की वाणी, दोहनानन्दाष्टक (4)
गाय का दूध दुहते समय, जैसे ही श्यामसुंदर की दृष्टि श्रीराधा के दिव्य रूप पर पड़ती है, वे ठगे से रह जाते हैं जिससे गाय के थन से दूध सीधे बर्तन में न गिरकर टेढ़ी-मेढ़ी धाराओं में बहने लगता है।

