षट् मुक्ति की चाह तजि - श्री गुरु छौनाजी महाराज

षट् मुक्ति की चाह तजि - श्री गुरु छौनाजी महाराज

षट् मुक्ति की चाह तजि, सहज भए निरवास।
‘जनछौना’ निज भाव रत, निरखै युगल विलास॥

- श्री गुरु छौनाजी महाराज

युगल रस के उपासक न केवल भुक्ति (सांसारिक) बल्कि छः प्रकार की मुक्ति (सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य, सायुज्य, सारष्टि एवं कैवल्य) की कामना को भी त्याग देते हैं। वे प्रिया-प्रियतम में निष्काम प्रेम को बढ़ाकर, संसार के आवागमन से सहजता से मुक्त हो जाते हैं एवं उनकी महल-टहल को प्राप्त कर लेते हैं। ऐसे उपासक प्रेम में अनुरक्त होकर युगल विहार का भावपूर्ण नेत्रों से सदा दर्शन करते रहते हैं।