श्रीवृन्दावन रज परस - श्री रामराय, गीत गोविंद ब्रज भाषा, दोहा (78)

श्रीवृन्दावन रज परस - श्री रामराय, गीत गोविंद ब्रज भाषा, दोहा (78)

श्रीवृन्दावन रज परस, सरस हरस सुखमूल।
श्रीवृन्दावन वास करि, श्रीयमुना के कूल॥
- श्री रामराय, गीत गोविंद ब्रज भाषा, दोहा (78)

श्री वृन्दावन की रज का स्पर्श अत्यंत सरस, हृदय को हर्षित करने वाला और समस्त सुखों का मूल है। इसलिए श्रीधाम वृन्दावन में यमुना तट पर वास कर अपने जीवन को सफल बनाना चाहिए।