श्रीराधे अब बेग सम्हारौ।
अहो नागरी झेर न कीजै, अपनी चेरी जान निहारौ॥ [1]
संशय हरौ ढरौ निज परिकर, यह अभिलाख हमारौ।
प्रेमसखी की अहो स्वामिनी, यह संदेह निवारौ॥ [2]
- श्री प्रेमदास जी (लाल बलबीर जी के भ्राता), श्री प्रेम दास जी की वाणी (97)
हे श्रीराधे! अब कृपया शीघ्र मुझे संभाल लीजिए। हे परम नागरी! अब तनिक भी देर न लगाइए, मुझे अपनी निज दासी जान, मुझ पर कृपादृष्टि डालिए। [1]
मेरे हृदय के समस्त संदेहों का हरण कर मुझे अपने सखियों के समूह में स्थान प्रदान करें।यही मेरी एकमात्र अभिलाषा है, हे स्वामिनी जू! इस संदेह का निवारण सदा के लिए अब कीजिए। [2]

