दो मन इक होते सुन्यौ, पै वह प्रेम न आहि।
हौइ जबै द्वै तनहुँ इक, सोई प्रेम कहाहि॥
- श्री रसखान, प्रेम वाटिका (34)
सिर्फ़ दो मनों का एक हो जाना ही सच्चा प्रेम नहीं कहलाता। जब मन और तन दोनों का पूर्णतः मिलन हो जाए, तभी उसे सर्वोत्तम प्रेम का स्वरूप माना जाता है।

