कैइक स्वाँग बनाइकै, नाचौ वहु विधि नाच ।
रीझत नहिं रिझवार वह, बिना हिए के साँच ॥
- श्री रसनिधि
रसनिधि कहते हैं कि तुम चाहे कितने ही स्वांग बनाकर नाना प्रकार के नाच क्यों न नाच लो, पर जब तक तुम्हारा हृदय सच्चा नहीं हो जाता, तब तक भगवान श्रीकृष्ण तुम पर कभी प्रसन्न नहीं होंगे। भाव यह है कि मनुष्य चाहे भगवा कपड़े पहने, चाहे सिर मुंडाए, चाहे जटा बढ़ाए—इन बाहरी आडंबरों से भगवद्प्राप्ति नहीं होती। वे तो केवल छल-कपट त्यागकर हृदय से प्रेमपूर्वक भजन करने वाले को ही प्राप्त होते हैं।
रीझत नहिं रिझवार वह, बिना हिए के साँच ॥
- श्री रसनिधि
रसनिधि कहते हैं कि तुम चाहे कितने ही स्वांग बनाकर नाना प्रकार के नाच क्यों न नाच लो, पर जब तक तुम्हारा हृदय सच्चा नहीं हो जाता, तब तक भगवान श्रीकृष्ण तुम पर कभी प्रसन्न नहीं होंगे। भाव यह है कि मनुष्य चाहे भगवा कपड़े पहने, चाहे सिर मुंडाए, चाहे जटा बढ़ाए—इन बाहरी आडंबरों से भगवद्प्राप्ति नहीं होती। वे तो केवल छल-कपट त्यागकर हृदय से प्रेमपूर्वक भजन करने वाले को ही प्राप्त होते हैं।

