अहो! दोउन के मुख चंद्र लसै - ब्रज के सवैया

अहो! दोउन के मुख चंद्र लसै - ब्रज के सवैया

(सवैया)
अहो! दोउन के मुख चंद्र लसै,
अरु दोउन के दृग चारु चकोरी।
पट स्यामल श्याम लखौ पहिने,
पटपीत कसे कटि राधिका गोरी॥ [1]
अजी प्रीति की रीति की कौन कहै ?
विपरीत बनी अति अद्भुत जोरी !
सखि! सुन्दर कौन कहौ इनमें,
वृषभानु दुलारे कि नंद किशोरी॥ [2]

- ब्रज के सवैया

हे सखी! दोनों श्री राधा और श्री कृष्ण के मुख चंद्र के समान हैं एवं दोनों ही एक दूसरे के मुखचंद्र की चकोरी भी हैं । श्याम वर्ण वाले श्यामसुंदर ने स्यामवर्ण वस्त्र पहना है और गोरी राधिका ने पीत वस्त्र कमर पर कस के बांध रखे हैं। [1]

प्रेम की यह लीला कैसी है, यह समझ पाना कठिन है क्योंकि यह अद्भुत जोड़ी आज एक दूसरे के रूप के विपरीत बनी हैं। हे सखी! अब तू ही बता, इनमें अधिक सुंदर कौन है — वृषभानु का लाड़ला श्री राधा या नंद की किशोरी कृष्ण? [2]