मेरी स्वामिनी प्रसन्न बदन साँवरौ सुखरासि - श्री बिहारिन देव जू की वाणी, रस के पद (20)

मेरी स्वामिनी प्रसन्न बदन साँवरौ सुखरासि - श्री बिहारिन देव जू की वाणी, रस के पद (20)

मेरी स्वामिनी प्रसन्न बदन साँवरौ सुखरासि ।
इनहिं लडाऊँ अनुदिन छिन छिन लहों स्याबासि॥ [1]
फूली फूली टहल करों मन के मननि हुलासि ।
अनन्य श्रीहरिदास बिपुल बलि बलि बिहारिनिदासि ॥ [2]

- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जू की वाणी, रस के पद (20)

मेरी स्वामिनी श्री राधा जी प्रसन्न मुख वाली हैं और श्रीकृष्ण सुख की राशि हैं । मैं इन दोनों को नित्य-प्रतिदिन, क्षण-क्षण लाड़ लड़ाता रहूँ और इनकी शाबाशी पाता रहूँ । [1]

मैं अति प्रसन्नचित्त होकर, प्रेम में उन्मत्त होकर इनकी महल-टहल (सेवा) में तत्पर रहूँ। श्रीबिहारिन देव कहते हैं—मैं स्वामी श्रीहरिदास जी और विट्ठलविपुल देव जी के रस-मार्ग की अनन्यता को धारण कर, बार-बार बलिहारी जाऊँ। [2]