रसस्वरूपः श्रीकृष्णः रसिकस्तु - श्री वागीश शास्त्री जी, श्री राधा नाम सुधा (6)

रसस्वरूपः श्रीकृष्णः रसिकस्तु - श्री वागीश शास्त्री जी, श्री राधा नाम सुधा (6)

रसस्वरूपः श्रीकृष्णः रसिकस्तु यया कृतः
रेमे तया चात्मरतः आत्मा रामोप्यखण्डितः ।
तवेति तृतीया हेतौ-बुधैर्सया शुकोक्तितः
भक्तांश्च प्रेमदानेन करोति रसभोगिनः ॥

- श्री वागीश शास्त्री जी, श्री राधा नाम सुधा (6)

श्रुतियों ने भगवान् को रस स्वरूप आनन्द स्वरूप बताया है, रस का भोक्ता नहीं बताया। रसभोक्ता रसिक तो उनको श्रीराधा ने बनाया है। भागवत में श्रीशुकदेवजी ने कहा है कि श्रीकृष्ण तो आत्मरत और आत्माराम हैं, उनको रमण तो राधा ने कराया है। "तया" यह हेतु के अर्थ में तृतीया विभक्ति है - ऐसा विद्वानों का मत है। भक्तों को भी प्रेमदान करके उनको रसिक (रसभोगी) राधा ही बनाती हैं ।