प्यारी-मुख-मयंक निशि-भोर।
षोड़श कला रूप-गुन सेवत, ईषद हास किरनि सब ओर॥ [1]
अधर-सुधा-माधुरी मनोहर, पीवत पिय अनुराग चकोर।
त्रिपित न ‘कली अली’ दिन देखत, सुख-सागर नागरी-किशोर॥ [2]
- श्री कल्याण पुजारी जी, श्री हित कल्याण पुजारी जी की वाणी (58)
श्रीराधाजू का मुख चंद्रमा के समान है, जो रूप और गुणों की सोलह कलाओं से युक्त है, जिसकी मंद मुस्कान की किरणें चारों ओर फैल रही हैं। [1]
उनके अमृतमय अधरों की मधुरता इतनी मनोहर है कि स्वयं श्रीकृष्ण, प्रेम से भरपूर चकोर के समान, उन्हें निरंतर पान करते हैं। अथाह सुख-सागर किशोरी श्रीराधा को दिन-भर निहारकर भी सखियों की अँखियाँ तृप्त नहीं होतीं। [2
षोड़श कला रूप-गुन सेवत, ईषद हास किरनि सब ओर॥ [1]
अधर-सुधा-माधुरी मनोहर, पीवत पिय अनुराग चकोर।
त्रिपित न ‘कली अली’ दिन देखत, सुख-सागर नागरी-किशोर॥ [2]
- श्री कल्याण पुजारी जी, श्री हित कल्याण पुजारी जी की वाणी (58)
श्रीराधाजू का मुख चंद्रमा के समान है, जो रूप और गुणों की सोलह कलाओं से युक्त है, जिसकी मंद मुस्कान की किरणें चारों ओर फैल रही हैं। [1]
उनके अमृतमय अधरों की मधुरता इतनी मनोहर है कि स्वयं श्रीकृष्ण, प्रेम से भरपूर चकोर के समान, उन्हें निरंतर पान करते हैं। अथाह सुख-सागर किशोरी श्रीराधा को दिन-भर निहारकर भी सखियों की अँखियाँ तृप्त नहीं होतीं। [2

