तन मन वचननि लाड़िली, मेरी जीवन प्रान।
ललित केलि अंग संग सदा, बिहरत रसिक सुजान॥
- श्री ललितकिशोरी देव, श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (650)
मेरे तन, मन और वाणी में पूर्ण रूप से लाड़ली जी (श्री राधा) ही समाई हुई हैं, जो मेरे जीवन की प्राण स्वरूपा हैं। नित्य विहार की सुंदर केली-लीलाओं में सदा लीन होकर, वे कुंज बिहारी के साथ रस-क्रीड़ा में निरंतर मग्न रहती हैं।
ललित केलि अंग संग सदा, बिहरत रसिक सुजान॥
- श्री ललितकिशोरी देव, श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (650)
मेरे तन, मन और वाणी में पूर्ण रूप से लाड़ली जी (श्री राधा) ही समाई हुई हैं, जो मेरे जीवन की प्राण स्वरूपा हैं। नित्य विहार की सुंदर केली-लीलाओं में सदा लीन होकर, वे कुंज बिहारी के साथ रस-क्रीड़ा में निरंतर मग्न रहती हैं।

