(राग कालिंगड़ा)
मैं कहा जानूँ कुंजबिहारी।
किहि कारण रूठी है तुम सों, चंद्रमुखी वृषभानकुमारी॥ [1]
जब ते उठी प्रिया सोवत तें, तबही सों मन में रिस भारी।
ना जानूँ कछु सपने में उन, देखी है करतूति तिहारी ॥ [2]
ठाड़े रहौ भीतर मति जावौ, प्रीतम मानो कही हमारी।
नारायण जो भुज गहि रोकूँ, फिर कहा बात रहे गिरिधारी॥ [3]
- श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, सम्भ्रम-मानलीला (10)
सखी के वचन श्री कृष्ण के प्रति -
हे कुंजबिहारी! मुझे नहीं पता कि श्री वृषभानु की चंद्रमुखी पुत्री, श्री राधा, तुमसे किस कारण रूठ गई हैं। [1]
जबसे वे निद्रा से उठीं हैं, तभी से उनके मन में बहुत रोष है। मैं नहीं जानती कि उन्होंने स्वप्न में कोई तुम्हारी करतूत देख ली है या कोई अन्य बात है। [2]
अब तुम यहीं खड़े रहो, भीतर मत जाओ — हे प्रीतम! मेरी बात मानो। अब यदि तुम अंदर प्रवेश करने की चेष्टा करोगे तो मैं तुम्हारी बाँह पकड़कर तुमको रोकूँगी, तो फिर वो तुम्हारे लिए ठीक न होगा गिरिधारी! [3]
मैं कहा जानूँ कुंजबिहारी।
किहि कारण रूठी है तुम सों, चंद्रमुखी वृषभानकुमारी॥ [1]
जब ते उठी प्रिया सोवत तें, तबही सों मन में रिस भारी।
ना जानूँ कछु सपने में उन, देखी है करतूति तिहारी ॥ [2]
ठाड़े रहौ भीतर मति जावौ, प्रीतम मानो कही हमारी।
नारायण जो भुज गहि रोकूँ, फिर कहा बात रहे गिरिधारी॥ [3]
- श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, सम्भ्रम-मानलीला (10)
सखी के वचन श्री कृष्ण के प्रति -
हे कुंजबिहारी! मुझे नहीं पता कि श्री वृषभानु की चंद्रमुखी पुत्री, श्री राधा, तुमसे किस कारण रूठ गई हैं। [1]
जबसे वे निद्रा से उठीं हैं, तभी से उनके मन में बहुत रोष है। मैं नहीं जानती कि उन्होंने स्वप्न में कोई तुम्हारी करतूत देख ली है या कोई अन्य बात है। [2]
अब तुम यहीं खड़े रहो, भीतर मत जाओ — हे प्रीतम! मेरी बात मानो। अब यदि तुम अंदर प्रवेश करने की चेष्टा करोगे तो मैं तुम्हारी बाँह पकड़कर तुमको रोकूँगी, तो फिर वो तुम्हारे लिए ठीक न होगा गिरिधारी! [3]

