नेक विलोकि री इकवार - श्री रूपरसिक देवाचार्य

नेक विलोकि री इकवार - श्री रूपरसिक देवाचार्य

नेक विलोकि री ! इकवार।
जो तूं प्रीति करन की गाहक, मोहन हैं रिझवार॥ [1]
महा-रूप की रासि नागरी, नागर नंदकुमार ।
हाव, भाव, लीला ललचोहीं, लालन नवल विहार॥ [2]
मोहि भरोसो स्यामसुंदर कौ, करिराख्यौ निरधार ।
नेक एक पल जो अभिलाषें, 'रूपरसिक' बलिहार ॥ [3]

- श्री रूपरसिक देवाचार्य

एक बार उनको निहारो; यदि तुम प्रेम की सच्ची ग्राहक हो, तो जान लो मोहन वही हैं जो हर हृदय को रिझा लेते हैं। [1]

श्रीराधा अतुल सौन्दर्य-सम्पदा की धनी हैं और नंदकुमार परिष्कृत रसिक हैं; उनके हाव-भाव और लीलाएँ देखते ही मन ललचा उठता है; जिनका विहार सदैव नूतन है। [2]

मुझे श्री श्यामसुंदर पर पूरा भरोसा है, उन्होंने मुझ दीन जिसका अन्य कोई सहारा नहीं है, उसे भी संभाल रखा है। जो भी एक पल को भी सच्चे मन से उनकी लालसा करे, उस पर ‘रूपरसिक’ स्वयं को न्यौछावर करते हैं । [3]