दास कै तो रावरी ये आस बिसवास दृढ़ - श्री रतन अलि

दास कै तो रावरी ये आस बिसवास दृढ़ - श्री रतन अलि

(कवित्त)
दास कै तो रावरी ये आस बिसवास दृढ़, 
कौन के भरोसें तुम है उदास रहे मौन। [1] 
एहो श्याम आरत पुकारत हौं बार-बार, 
तारत सुने हो आगे करि कहि दूरि गौन॥ [2] 
बिरदै विचारि निरदै न होउ हिरदै में, 
दरदैं पिचानि अमै बरदै न होड तौन। [3]
हंसी की न बात अब तो हौं डूब्यो जात, 
ठाढ़े देखत कहा मेरी नाव पार करो क्यों न? [4]

- श्री रतन अलि

हे प्रभु! इस दीन दास का दृढ़ विश्वास केवल आप ही पर है। मुझे किसी अन्य का कोई भरोसा नहीं, तो फिर आप क्यों उदास होकर मौन बैठे हैं? [1]

हे श्यामसुंदर! मैं आपको आर्त भाव से बार-बार पुकार रहा हूँ। आपने तो पूर्व में दुखियों को पुकारते ही तार दिया है, फिर आज मुझसे क्यों मुख मोड़ लिया? [2]

हे प्रभु! वेद, शास्त्र और सभी महापुरुष आपको दीनबन्धु और करुणा-सागर कहते हैं। कृपया अपनी इन्हीं उपाधियों का स्मरण कीजिए और मुझ पर कठोरता न कीजिए। मेरे दुःख को पहचानिए, क्योंकि आपसे बढ़कर वरदाता और कोई नहीं। [3]

अब यह हँसी की बात नहीं रही—मैं डूबता ही जा रहा हूँ। आप केवल खड़े-खड़े क्या देख रहे हैं, मेरी नाव को पार क्यों नहीं लगाते? [4]