न लोकाच्च भयं किंचित न  - श्री वंशीअलि, श्री राधासिद्धांत (99)

न लोकाच्च भयं किंचित न - श्री वंशीअलि, श्री राधासिद्धांत (99)

न लोकाच्च भयं किंचित न च निगमतः किंचित।
न स्पृहा सम्प्रदा‌यादेर्वयं राधापदेप्सव:॥

- श्री वंशीअलि, श्री राधासिद्धांत (99)

श्री राधा के चरणों की भक्ति में ऐसा कमाल है कि न तो लोक का कोई भय रह जाता है, न ही वेद-शास्त्र आदि के बंधनों का कोई भय रहता है।  इतना ही नहीं, ऐसे अनन्य श्री चरणों के भक्त को किसी विशेष संप्रदाय को धारण करने की इच्छा भी नहीं रहती। उसे तो केवल श्री राधा के चरणों की अनन्य एवं निष्काम भाव से सेवा करने की ही एकमात्र लालसा रह जाती है।