श्रीराधारमण नुकीले नैन - श्री गुणमंजरी दास

श्रीराधारमण नुकीले नैन - श्री गुणमंजरी दास

श्रीराधारमण नुकीले नैन।
वेधे बृज युवतिन मन माणिक, कहत बने नहि बैन॥ [1]
कल न परत पल मेरी सजनी, कहा दिवस कहा रैन।
गुण मंजरी बड़े चंचल हैं, अंचल सों करैं सैन॥ [2]

- श्री गुणमंजरी दास

श्रीराधारमण के नयन अत्यंत नुकीले हैं, जो बृज की नवयुवतियों के मन-रूपी माणिक्य को बींध देते हैं। उनके नयन इतने प्रभावशाली हैं कि वाणी उनका वर्णन नहीं कर सकती। [1]

अरी सखी! अब तो उनके नयनों की मार से मुझे एक क्षण का भी चैन नहीं रहा; दिन-रात का भान मिट चुका है। श्री गुण मंजरी दास कहते हैं — उनके बड़े-बड़े नेत्र अत्यंत चंचल हैं, जो अपनी अनोखी भंगिमाओं से निरंतर इशारे (सैन) करते रहते हैं। [2]