मदन नद तरंगैरूल्लसन्गोपनारी हृदयचिलचिमानामामिषं संजिहीर्षु :।
ब्रजपतितनयारव्यो धीवर प्रौढ वंशी कर हित मपि वादीत्यन्त तत्रास्तु वास:॥
- श्री केशवाचार्य, गोवर्द्धन शतक (96)
प्रेम की तरंगों से उल्लसित गोप-सुंदरियों के चंचल हृदयों को आकर्षित करने हेतु, जब नंदनंदन श्रीकृष्ण ने अपनी वंशी को कर-कमलों में धारण कर उसका मधुर वादन प्रारंभ किया, उसी गोवर्धन में मेरा निवास हो।
ब्रजपतितनयारव्यो धीवर प्रौढ वंशी कर हित मपि वादीत्यन्त तत्रास्तु वास:॥
- श्री केशवाचार्य, गोवर्द्धन शतक (96)
प्रेम की तरंगों से उल्लसित गोप-सुंदरियों के चंचल हृदयों को आकर्षित करने हेतु, जब नंदनंदन श्रीकृष्ण ने अपनी वंशी को कर-कमलों में धारण कर उसका मधुर वादन प्रारंभ किया, उसी गोवर्धन में मेरा निवास हो।

