(कवित्त)
भजौं तो गुपाल ही कौं सेवौं तो गुपालै एक,
मेरो मन लाग्यो सब भाँति नंदलाल सों । [1]
मेरे देव देवी गुरु माता पिता बंधु इष्ट,
मित्र सखा हरि नातो एक गोपबाल सों ॥ [2]
'हरीचंद' और सों न मेरो संबंध कछु,
आसरो सदैव एक लोचन विसाल सों । [3]
माँगों तो गुपाल सों न माँगों तो गुपाल ही सों,
रीझौं तो गुपाल पै औ खीझौं तो गुपाल सों ॥ [4]
- श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, विनय प्रेम पचासा (21)
यदि मैं पूजा करता हूँ तो वह केवल गोपाल की, यदि सेवा करता हूँ तो वह भी केवल गोपाल की — मेरा मन नंदलाल में ही सब भाँति से लगा हुआ है। [1]
मेरा देव, देवी, गुरु, माता-पिता, मित्र अथवा मेरे इष्ट — हर रिश्ता केवल उस ग्वालबाल, श्रीकृष्ण से ही है। [2]
हरिचंद कहते हैं, मैं किसी और को नहीं जानता; मेरा अनन्य आश्रय तो कमलनयन श्री कृष्ण चंद्र से ही है। [3]
यदि मैं माँगता हूँ तो गोपाल से ही, यदि नहीं माँगता तो भी प्रेम गोपाल से ही; यदि प्रसन्न हूँ तो उनसे ही, और यदि नाराज़ हूँ तो भी उनसे ही — सब कुछ उन्हीं से ही आरम्भ होता है और उन्हीं पर समाप्त। [4]
भजौं तो गुपाल ही कौं सेवौं तो गुपालै एक,
मेरो मन लाग्यो सब भाँति नंदलाल सों । [1]
मेरे देव देवी गुरु माता पिता बंधु इष्ट,
मित्र सखा हरि नातो एक गोपबाल सों ॥ [2]
'हरीचंद' और सों न मेरो संबंध कछु,
आसरो सदैव एक लोचन विसाल सों । [3]
माँगों तो गुपाल सों न माँगों तो गुपाल ही सों,
रीझौं तो गुपाल पै औ खीझौं तो गुपाल सों ॥ [4]
- श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, विनय प्रेम पचासा (21)
यदि मैं पूजा करता हूँ तो वह केवल गोपाल की, यदि सेवा करता हूँ तो वह भी केवल गोपाल की — मेरा मन नंदलाल में ही सब भाँति से लगा हुआ है। [1]
मेरा देव, देवी, गुरु, माता-पिता, मित्र अथवा मेरे इष्ट — हर रिश्ता केवल उस ग्वालबाल, श्रीकृष्ण से ही है। [2]
हरिचंद कहते हैं, मैं किसी और को नहीं जानता; मेरा अनन्य आश्रय तो कमलनयन श्री कृष्ण चंद्र से ही है। [3]
यदि मैं माँगता हूँ तो गोपाल से ही, यदि नहीं माँगता तो भी प्रेम गोपाल से ही; यदि प्रसन्न हूँ तो उनसे ही, और यदि नाराज़ हूँ तो भी उनसे ही — सब कुछ उन्हीं से ही आरम्भ होता है और उन्हीं पर समाप्त। [4]

