दम्पति दोउ राजत कुंज-भवन - श्री कुम्भनदास जी की वाणी (385)

दम्पति दोउ राजत कुंज-भवन - श्री कुम्भनदास जी की वाणी (385)

(राग हमीर)
दम्पति दोउ राजत कुंज-भवन ।
पीत कुल्है सिर, कटि पियरौ पट, कुंडल ललित श्रवन ॥ [1]
विजना-बियार ढोरति सखी नियरें, सीतल लागत पवन ।
'कुंभनदास' गोवर्द्धन-धर, रिझावत प्यारी राधा रवँन ॥ [2]

- श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी (385)

दिव्य दंपति श्रीराधा-कृष्ण कुंज-भवन में विराज रहे हैं। कृष्ण के सिर पर पीली पगड़ी बँधी है, कटि पर पीला पट है, और कर्णों में सुंदर कुण्डल शोभा दे रहे हैं। [1]

उनके समीप ही एक सखी हाथ में पंखा लिए उन्हें हवा झल रही है, जिसकी शीतल हवा प्रीतम प्यारी को शीतलता दे रही है। श्री कुंभनदास कहते हैं, गोवर्धन-धारी श्री कृष्ण मधुर लीलायों से राधा प्यारी को रिझा रहे हैं। [2]