कीरति किसोरी वृषभान की दुलारी राधा - श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (99)

कीरति किसोरी वृषभान की दुलारी राधा - श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (99)

(कवित्त)
कीरति किसोरी वृषभान की दुलारी राधा,
सहज सखीन लै निकुंजन को डगरी । [1]
चरन की चौकी की चमक चारु अंगन की,
कैयो रंग रंगन की जोति ब्रज बगरी ॥ [2]
देखै पग द्वारै वारै तन मन प्रान हठी,
रूप चक चौंधा रही चौंक सब नगरी । [3]
कैधौं सुखमा है कै दमा है कै तमा है कै,
उमा है इन्दुमा है कै रमा है रूप आगरी ॥ [4]

- श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (99)

वृषभानु दुलारी श्री राधा अपनी सखियों के साथ सहज भाव से निकुंज के मार्ग की ओर चली जा रही हैं। [1]

उनके चरण-चिह्नों की चौकी की आभा से अद्भुत चमक छा गई है, मानो पूरे ब्रज में सौंदर्य की एक नई लहर और ज्योति फैल गई हो। [2]

अपने द्वार पर उनके पग-चिन्ह देखते ही लोग तन-मन-प्राण अर्पित कर बैठे हैं; उनकी छटा की चकाचौंध से सारी नगरी चौंक गई है। [3]

लोग अचंभित हैं, यह सौन्दर्य आखिर है क्या—सुख की मूर्ति? प्राणों की शान्ति? अथवा तम-हरिणी (अंधकार का हरण करने वाली) आभा? कोई कहे यह पार्वती हैं, कोई कहे इन्दुमा, कोई कहे लक्ष्मी हैं — परंतु वे तो रूप की पराकाष्ठा, श्री राधा महारानी हैं। [4]