आजु बधाई है बरसानैं -  श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्ध (355)

आजु बधाई है बरसानैं - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्ध (355)

(राग जयतिश्री व देवगन्धार)
आजु बधाई है बरसानैं।
कुँवरि किसोरी जनम लयौ, सब लोक बजे सहदानैं ॥ [1]
कहत नंद वृषभानराय सौं, और बात को जानैं।
आजु भैया हम सब व्रजवासी, तेरे ही हाथ बिकानैं॥ [2]
या कन्या के आगें कोटिक, बेटनिं कौ अब मानैं।
तेरे भलैं, भलौ सबही कौ, आनँद कौंन बखानैं॥ [3]
छैल छबीले ग्वाल रँगीले, हरद, दही लपटानैं।
भूषन वसन विविधि पहिरे, तन गनत न राजा रानैं॥ [4]
नाँचत गावत प्रमुदित ह्वै नर, नारिनु को पहिचानैं।
व्यास रसिक सब तन मन फूलै, नीरस सबै खिसानैं॥ [5]

- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्ध (355)

बरसाना आज बधाइयों से गूंज रहा है — वृषभानु जी के घर कुँवरि किशोरी श्री राधा का अवतरण हुआ है, और समस्त लोकों में मंगलध्वनि गूंज रही है। [1]

नंद जी, वृषभानु महाराज से कहते हैं — “श्रीराधा के अतिरिक्त और कोई चर्चा योग्य नहीं रही। आज तो हम समस्त व्रजवासी तुम्हारे हाथों पूर्णतः समर्पित हो गए हैं।” [2]

इस दिव्य कन्या के आगे अब करोड़ों पुत्रों का मान-सम्मान भी तुच्छ प्रतीत होता है। वास्तव में तुम्हारा ही नहीं, यह तो समस्त जग का कल्याण करने वाली हैं — इस अलौकिक आनंद को शब्दों में कौन बयान कर सकता है? [3]

सुंदर-सुंदर ग्वालों ने अपने शरीर पर हल्दी-दही का लेप किया है। उन्होंने विविध आभूषण और मनोहारी वस्त्र धारण किए हैं — उनकी शोभा के आगे राजा-रानियों की भी छटा फीकी लगती है। [4]

स्त्री-पुरुष सभी आनंदातिरेक में मग्न होकर नृत्य और गायन में डूबे हुए हैं। श्री हरिराम व्यास कहते हैं — आज राधाष्टमी के अवसर पर समस्त रसिकजन तन-मन से पुलकित हो उठे हैं, और जो नीरस हैं, वे सब कोने में खिसिया गए हैं। [5]