अब कोउ कहो कूर कुटिल यह, कामी कृपन कहो कोउ मौंनी ।
यौं कौतिक कृपा निरखै नित्य, श्रीनागरीदासि लियैं रस थौंनी ॥
- श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जी की वाणी, साखी (16)
हे भाई! चाहे अब कोई हमें क्रूर, कुटिल, कृपण, कामी अथवा मौनी क्यों न कहे — इन बातों की ओर हमारा कोई ध्यान ही नहीं है। श्रीस्वामी हरिदास जी की कृपा से रस-विलासमय श्रीयुगल के अद्भुत नित्य विहार-रस को हम मनभावते भाव से ऐसे निहारते हैं, जैसे कोई गाय के थन को मुँह में लेकर दूध पीता हो।
यौं कौतिक कृपा निरखै नित्य, श्रीनागरीदासि लियैं रस थौंनी ॥
- श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जी की वाणी, साखी (16)
हे भाई! चाहे अब कोई हमें क्रूर, कुटिल, कृपण, कामी अथवा मौनी क्यों न कहे — इन बातों की ओर हमारा कोई ध्यान ही नहीं है। श्रीस्वामी हरिदास जी की कृपा से रस-विलासमय श्रीयुगल के अद्भुत नित्य विहार-रस को हम मनभावते भाव से ऐसे निहारते हैं, जैसे कोई गाय के थन को मुँह में लेकर दूध पीता हो।

