बरसाने वृषभान गोप घर - श्री कल्याण दास

बरसाने वृषभान गोप घर - श्री कल्याण दास

बरसाने वृषभान गोप घर, सोभा की निधि आई री।
धनि-धनि कूख महरि कीरति, की जिन यह कन्या जाई री॥ [1]
अखिल लोक भुव नाग लोक में, देखी सुनी न निकाई री।
सिंधुसुता गिरिसुता सची रति, नहिं समान कोऊ पाई री॥ [2]
आनंद मुदित जसोदा रानी, कान्हर की करौं सगाई री।
प्रभु कल्यान गिरधर की जोरी, विधना यहै बनाई री॥ [3]

- श्री कल्याण दास

बरसाने में वृषभानु गोप के घर सौंदर्य और शोभा की साक्षात् निधि प्रकट हुई हैं। कीरतिरानी की कोख वास्तव में धन्य है, जिन्होनें ऐसी अद्भुत कन्या को जन्म दिया है। [1]

तीनों लोकों में इस कन्या जैसी सुंदरता किसी ने न तो देखी है और न ही सुनी है। लक्ष्मी, पार्वती, इन्द्राणी और रति जैसी देवियाँ भी इसकी समता नहीं कर सकतीं। [2]

जब यह आनंददायक समाचार यशोदारानी तक पहुँचा, तो वे अत्यंत प्रसन्न होकर सोचने लगीं — “मैं अपने लाला की सगाई इसी कन्या के साथ करूँगी।” कल्याण प्रभु कहते हैं — स्वयं ब्रह्मा ने गिरधर के लिए यही युगल जोड़ी निश्चित की है। [3]