यह सुख समुझन कौं कछू - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, प्रेमावली (49)

यह सुख समुझन कौं कछू - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, प्रेमावली (49)

यह सुख समुझन कौं कछू, नाहिंन आन उपाइ।
प्रेम दरीची जौ कबहुँ, सहज कृपा खुलि जाइ॥

- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, प्रेमावली (49)

वृन्दावन रस का अनुभव किसी साधन या उपाय से संभव नहीं है। केवल श्री किशोरी जी की निष्कारण (अहैतुकी) कृपा ही इसका द्वार खोल सकती है। जब उनकी कृपा-बल से प्रेम का झरोखा खुलता है, तभी इस रस का साक्षात् अनुभव संभव होता है।