कोई कहै बैकुंठ, कोई कहै ब्रह्म है - श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (346)

कोई कहै बैकुंठ, कोई कहै ब्रह्म है - श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (346)

कोई कहै बैकुंठ, कोई कहै ब्रह्म है।
कोई कहै इह राम, कोई कहै कृष्ण है ॥ [1]
कोई कहै यह कुंजनि-कुंजनि, रास कियौ निरधार है।
हरि हाँ, सबै तजौ जंजाल, भजौ हरिदास कह्यौ सुखसार है ॥ [2]

- श्री ललितकिशोरी देव, श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (346)

कोई भगवान का निज स्वरूप वैकुंठनाथ को बताता है, कोई ब्रह्म को बताता है। कोई अयोध्यानाथ श्री राम को बताता है तो कोई स्वयं भगवान श्री कृष्ण को बताता है । [1]

कोई कुंज-कुंज रास विलास करने वाले स्वरूप को बताता है। श्री ललित किशोरी देव कहते हैं कि तुम इस तमाम जंजाल को त्यागकर, समस्त सुखों के सार स्वरूप, उस नित्यविहार को भजो, जिसे अनन्य रसिक शिरोमणि  स्वामी हरिदास जी महाराज ने गाया है । [2]