तेरे चरनन में बलि जाऊँ ।
हे मनमोहन श्री बनवारी, दरशन से सुख पाऊँ ॥ [1]
माखन मिश्री मोदक मेवा, प्रेम से तोहे खिलाऊँ ।
रोम रोम में तेरी सूरत, इक पल भूल न पाऊँ ॥ [2]
नन्द गांव गोकुल गोवरधन, ब्रिज तज अनत न जाऊँ ।
'भोली-गोपी' चरनन दासी, जग में तेरी कहाऊँ ॥ [3]
- श्री भोली गोपी
हे मनमोहन बनवारी, मैं तेरे चरणों पर वारी-वारी जाऊँ ! तुम्हारे दर्शन से ही मुझे वास्तविक सुख मिलता है। [1]
मैं प्रेम से तुम्हें माखन, मिश्री, मोदक और मेवा खिलाऊँगी। तुम्हारी सूरत मेरे रोम-रोम में बसी है, मैं तुम्हें एक पल भी भूल नहीं सकती। [2]
मैं नन्दगाँव, गोकुल, गोवर्धन एवं ब्रजधाम को त्यागकर कहीं और नहीं जाऊँगी। भोली गोपी कहती है—मैं तेरे चरणों की दासी होकर जग में बस तेरी ही कहाऊँगी । [3]
हे मनमोहन श्री बनवारी, दरशन से सुख पाऊँ ॥ [1]
माखन मिश्री मोदक मेवा, प्रेम से तोहे खिलाऊँ ।
रोम रोम में तेरी सूरत, इक पल भूल न पाऊँ ॥ [2]
नन्द गांव गोकुल गोवरधन, ब्रिज तज अनत न जाऊँ ।
'भोली-गोपी' चरनन दासी, जग में तेरी कहाऊँ ॥ [3]
- श्री भोली गोपी
हे मनमोहन बनवारी, मैं तेरे चरणों पर वारी-वारी जाऊँ ! तुम्हारे दर्शन से ही मुझे वास्तविक सुख मिलता है। [1]
मैं प्रेम से तुम्हें माखन, मिश्री, मोदक और मेवा खिलाऊँगी। तुम्हारी सूरत मेरे रोम-रोम में बसी है, मैं तुम्हें एक पल भी भूल नहीं सकती। [2]
मैं नन्दगाँव, गोकुल, गोवर्धन एवं ब्रजधाम को त्यागकर कहीं और नहीं जाऊँगी। भोली गोपी कहती है—मैं तेरे चरणों की दासी होकर जग में बस तेरी ही कहाऊँगी । [3]

