राधे आन पड़ो तेरे द्वार - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (33)

राधे आन पड़ो तेरे द्वार - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (33)

(राग दुर्गा त्रिताल)
राधे आन पड़ो तेरे द्वार ।
तुम्हें छोड़ वृषभान दुलारी, कासौं करूँ पुकार ॥ [1]
भवसागर में डूब रही हूँ, वेग लगाबो पार ।
शरण तिहारी आन पड़ी हूँ, अब ना मानो भार ॥ [2]
जीवन प्राण अधार तुम्हीं हो, ये मन लीनो धार ।
श्रीगोपाल हित हरि स्वामिनि, तुम बिन हों बेकार ॥ [3]

- श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (33)

हे राधे! मैं तुम्हारे द्वार पर आन पड़ी हूँ । हे वृषभानु नंदिनी! तुम्हें छोड़कर अब मैं किसे पुकारूँ? [1]

मैं संसार-सागर में डूब रही हूँ, कृपया अपनी कृपा की नाव से मुझे पार लगा दो। मैं तुम्हारी शरण में आ चुकी हूँ, अब मुझे बोझ मत समझो। [2]

तुम ही मेरे जीवन और प्राणों की आधार हो। श्री हित गोपाल दास कहते हैं कि हे हरि की स्वामिनी! तुम्हारे बिना मैं किसी योग्य नहीं, तुम ही मेरी सर्वस्व हो! [3]